DEVYANI PUBLICATION
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गावं का इतिहास ( भाग -1 & 2 ) – डॉ अंकुश भारद्वाज
Original price was: Rs.650.00.Rs.520.00Current price is: Rs.520.00.Buy Nowडॉ. अंकुश भारद्वाज गहन शोधपूर्ण व्याख्यागांव का इतिहास (भाग 1 & 2)” हमें उस पल-पल के दस्तावेज़ और लोककथाओं की दुनिया में ले जाती है, जहाँ मिट में बिखरे अनकहे्से सजीव हो उठते हैं। पहले भाग में आप पाएंगे कैसे सामाजिक संराएँ, जाति-धर्म के रीतिरिवाज और स्थानीय शासन-व्यव ने दशकों तक ग्रामीण जीवन को आकार दिया। दस्तावेजी साक्ष्यों और मौखिक किलकारियों के माध्य से उभर हैं वे किरदार, अपनेों और उत्सवों गाँव की पहचान गढ़। दूसरे भाग लेखक ने उपनिवी आक्रमण से लेकर आज की नवाचारपूर्ण कृषि तकनीकों तक की यात्रा को विस्तार से अंकित किया है। हर अध्याय में पाएँगे परिवर्तन की लय—जैसे सहिता आंदोलनों ने सामाजिक दूरी मिटाई या कैसे सड़करेल और इंटरनेट की पहुंच ने परंपराओं को नए आयाम दिए। शोधपत्रों से खेत-खलिहान तक फैली व्यावहारिक जानकार ग्रामीण भारत केक्ष्म लेकिन प्रगतिशील चेहरे को उजागर करती हैंसमृद्ध पद्यात्मक शैली और स्पष्ट विश्लेषण से बुनी यह द्वि-खंड रचना न केवल इतिहासकारों या सामाजिक वैज्ञानिकों के लिए, बल्कि उन सभी के लिए अनोल साधन है जो भारत के जड़ से जुड़ी कहानियों में सांस लेना चाहते हैं।्टी की ग, लोकगीतों की लय समय धक्कों से संघर्ष करती वो जीवंत दास्तें, डॉ. भारद्वाज की कलम से आपके समक्ष जीवंत हो उठती हैं।
Dr. अंकुश भारद्वाज ने पीढ़ियों से संजोई लोककथाओं, अभिलेखों और मौखिक परंपराओं को पारदर्शी रूप में सामने लाकर प्राचीन से आधुनिक तक के परिवर्तन को जीवंत कर है। अय दर अध्याय मिलता है खेत में उगीान की थर-रट का संगीत, चौपाल की हँसी-ठिठोली में ब समाज की रीति-रिवाजों की गाई मंदिरों के शिला-लेखों में छिपे सत्ताकालीन संघर्ष और सामिक चेतना के स्वर। हरृष्ठ पर गाँव की मिट से उठतीबू, लोगों की आकांक्षाएँ प्रेम-श्रा और संघर्षों की झलक आपको उस युग में ले जाती है हर पत्थ, गीत हर जुगू चम अपने आप में एक जीवंत दस्तावेज बनकर बोल उठती है। भाग एक में मिलेगी आधारशिला—प्राचीन, संगठन और कृषिालियाँ; भाग दो में दिखेंगे औपनिवेशिक प्रभाव, स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारियाँ और नव-आधुनिक का आगमन यह पुस्तक न इतिहास किताब है, बल्कि वह दर्पण है आज ग्रामीण भारत का हर अंश प्रतिबिंबित होता दिखता।
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समग्र वस्तुनिष्ठ समाजशास्त्र – डॉ मोहिंदर कुमार सलारिया
Original price was: Rs.700.00.Rs.560.00Current price is: Rs.560.00.Buy Nowडॉ. मोहिंदर कुमार सलारिया ने गहन शोध, सजीव उदाहरण और सांख्यिकीय विश्लेषण के समन्वय से इस में सामाजिक संरचनाओं, समूह गतिशीलता, संस्कृतिक परिवर्तन तथा व्यक्तियों और संस्थाओं के परस्पर संबंधों की विस्तृत पड़ताल की। प्रत्येक अध्य में तर्कसंगत व्याख्याएँ और विश्वव्यी संदर्भक को बदलती दुनिया के सामाजिक ताने-बाने को स्पष्ट से देखने में मदद करते हैं। Whether you are a student aiming to deepen your theoretical समझ, एक शोधकर्ता जो जटिल सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोज रहा हो, या सामाजिक में रुचि रखने वाला कोई भी पाठक—यह र आपको समाज केक्ष्मतम स्तर से ले कर व्यापक संरचनाओं तक की यात्रा कराएगी।
समग्र वस्तुनिष्ठ समाजशास्त्र एक ऐसा द्योतक-पुस्तक है जो समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को ठोस प्रमाणों और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण से जोड़कर आधुनिक समाज की जटिलताओं पर नई रोशनी डालता।ॉ. मोहिंदर कुमार सलारिया ने इसमें सामाजिक संराओं मूल्य-प्रालियों और मानव व्यवहार के अंतःसंबंधों को गहन अध्ययनों, केस स्टडीज और सांख्यिकीय दृष्टिकोण के से प्रस्तुत किया है। ग्रामीण-शहरी परिवर्तन, ग्लोबलाइजेशन, लिंग और जाति जैसे सामाजित विभाजनों से लेकर डिजिटल युग कीौतियों तक, हर अध्याय संदर्भ और उदाहरणों के साथ विषय को जीवंत बनाता। सिद्धांत और अनुसंधानियों का संतुलनक को आलोचनात्मक सोच और प्राथमिक डेटा संग्रह के यथार्थ अनुभव से परिचित कराता है। यह पुस्तक केवल शैक्षणिक गुणों में समृद्ध है, बल्कि समाजशास्त्र के विद्यार्थी, अध्यापक और शोधकर्ता—सबके लिए व्यवहारिक मार्गदर्शक भी है, जो सामाजिक यथार्थ को समझने और बदल की दिशा में ठोस आधारशिला साबित होती है।
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हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर (भाग -1) – बारू राम ठाकुर / कर्म सिंह
Original price was: Rs.500.00.Rs.400.00Current price is: Rs.400.00.Buy Nowहिमाचल की ऊचाइयों से आती उन कहियों का संग्रह, जहाँ बर्फ़ से लदे पहाड़ों के बीच बसे छोटे-छोटे गाँवों में आज भी ज्यों की त्यों बसी हुई हैं सदियों पुरानी लोकपरंपराएँ।
बारू राम ठाकुर व कर्म सिंह की लेखनी आपको ले चलती है देवभूमि घाटियों में—जहाँ मंदिरों की घंटियाँ, भांवरों कीरव और रंग-बिरंगे लोकनृत्यों की गूँज आज भी हवा में महक बिखेरती है। इस पहले भाग में जानिए कैसे हिमाचल की मिट्टी ने पालेगीतों की सहज मधुरता, पर्व-त्योहार की विविधता और स्थानीय हस्तशिल्प की बारीक।
राजाश्रयी स्थापत्य से लेकर खादी-कंगूर के कपड़ों तक, बनारसी झुमके से हिमाचलीाल तक—हर पन्ने आपको की जीवंत रूपरेखा दिखेगी। मुख्य रूप से उठते प्रश्न—इन परंपराओं ने जीवन शैली को संवारा? पर्वों ने ग्रामीण उत्सवों में कौन- रस घोले? उत्तर मिलेंगे उसन जहाँ शब्दों ने चित्रों का रूप धारण किया हो। ‘हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर (भाग-1)’ एक आत्मीय सफ़र, संस्कृति के हर रंग को उजागर करता है।
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हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत – बारू राम ठाकुर / मिहिर बोराना
Original price was: Rs.400.00.Rs.320.00Current price is: Rs.320.00.Buy Now—इस में आपको मिलेगा प्रदेश की सांस्क विरासत का हर रूप-रंग। बारू राम ठाकुर और मिहिर बोराना ने मिलकर हिमाचल की लोकथाओं, मेलों-त्योहारों, वादयंत्रों और लोकृत का ऐसा समग्र दर्शनचा, जो पाठक को हर पन्ने पर न जानकारी सिर्फ देता है, बल्कि उसकी कल्पाओं को नए आयाम प्रदान करता हैचुण्डा देवी मंदिर की वृद्ध टेराकोटा मूर्तियों से लेकर मनाली के बजार में बुनकरों के ताने-बाने तक, हर अध्याय हिमाचल की विविधता का जश्न मनाता। आप सुनेंगे ग्रामीण वाद जैसेोल, बंसुरी और शहनाई की लहरी, महसूस करेंगे किच्ची व चवरी चाय मिठास औरेंगे हूणाओं की चमत्कारिक कथाएँ। इसके साथ ही हथकरघा उद्योग, धूल मिट्टी की कलाकृतियाँ और पहाड़ी व्यंजनों कीबू भी जीवंत हो उठेगी। लेखकों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति आपको हिमाचल की वादियों में ले, जहाँ प्रत अनुभव और शोधपरक तथ्य एक साथ मिल इतिहास और लोकजीवन को नया स्वरूप देते हैं। उन पुरानी हवेलियों की खिड़कियों से झांकती परंपराएँ, पहाड़ी लोगों का जीवन-शैली और प्रकृति से उनका अनूठा रिश्ता—सब यहाँ आपके समक्ष खुले दिल से है। यदि हिमाचल की आत्मा कोना चाहते हैं, उसकीूँज से आँचल लेना चाहते हैं, तो इस पुस्तक में छुपी विरासत की हर गुंजलदार धड़कन आपके भीतर एक नई ताजगी भर देगी।
– हिमाचल प्रदेश की लोक संगीत और नृत्य परंपराएँ
– पारंपरिक शिल्प और कारीगरी – मान्यताएँ, रीति-रिवाज और तीर्थ स्थल
– स्थापत्य विरासत और ऐतिहासिक स्मारक
– मौखिक साहित्य, लोककथाएँ, कहानी सुनाना
– त्यौहार, मेले और सामुदायिक उत्सव
– स्वदेशी समुदाय और सामाजिक रीति-रिवाज
– अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत और संरक्षण प्रयास
पर्वतों की गोद में बसीाचल प्रदेश की प्राचीन परंपराएँ, लोकगीतों की अनुगूँज और देव-देवताओं की अविचल आस्था इसी अनूठी रूप में जीवंत होती दिखती है। सुनहरी धूप में चमकते मंदिरों के शंखनाद से लेकर बर्फ से ढ गाँवों में गूंजते पेण्डल केृत्य तक, हर चित्र-अलंकरण हिमाच संस्कृति के रंग और रूप की सम कहानी बयाँ करते हैं। ठ-ठगी, झड़ू और-घगरा की मर्मस्थ धुनें गुर्जर-ठाकुरों की गाएँ और लाहौल स्पीति की बौद्धासत—इन सबका सजीव दस्तावेजकरण पाठक को उस जीवंत लोकजीवन में ले जाता है जहां पर्व-ोहार, हस्तश्प और खानपान आपस में मिलकर एक अलग ही आत्मीयता रच जाते हैं। बारू राम ठाकुर व मिहिर बोराना की सूक्ष्म दृष्टि व सजीव शब्दावलीाचल की सांस्कृतिक विरासत को नित नए आयाम देती है, जैसे कोहरे से उभरता हिमालय।
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हिमाचल प्रदेश के गावं इतिहास , सभ्यता एवं संस्कृति ( भाग -1) – राकेश कुमार शर्मा
Original price was: Rs.400.00.Rs.320.00Current price is: Rs.320.00.Buy Nowहिमाचल प्रदेश की गोद में बसी ऊची–नीची वादियाँ भूले-बिसरे किले, लुप्त लोककथाएँ और सदियों से जगे हुए रीति-रिवाज—यह किताब आपको अनुए खंडरों और रंगीन मेलों के बीच से होते हुए एक नई यात्रा पर ले जाती है। पढ़ते-पते आप जानेंगे कैसे पर्वतीय हवाओं ने यहाँ की सामाजिकावट को सँवारा किस तरह देव केशीर्वाद से उपजी मानताएँ आज भी गांवों की पहचान हैं, और कैसे लोकगीतों में बुनकर बुनी गई कहियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन की साँस बनीं। ऐतिहासिक दस्तावेजों और लोक मौखिक परंपराओं भावों को एकसाथ पिरोकर, यह ग्रंथ हिमाचल के हर निर्वात को धड़कन भर उठतााता है। चाहे मिट्टी कीक या स्निग्ध पहड़ी का स्वाद—हर पन्ने बसती है एक अनछुई दुनिया, जिसे इस लेखन जीवंत कर दिया है।
इस पुस्तक में राकेश कुमार ने हिमाचल प्रदेश के ऐतिहासिकों की अनुई दास्तें शब्दों में पिरोई हैं—जहाँ पहाड़ों की काट और नदी-झरनों की उत्साही कलरब सदियों से अनूठ सभ्यता रची है। प्राचीन देवी-देवताओं के मंदिरों से लेकर लोकों रस पराइयों तक हर अध्याय आप देखेंगे कि कैसेसमी मेले,िवार रीति-िवाज और हस्तशिल्प बारीकियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहीं। गांव केकरी गलियों में गूंजते लोकनृत्य, चावल-धन की खुशबू से महकता त्यौहार, बुजुर्गों की जुबानी लोककथाएँ—इन तमाम अनुभवों मिलकर हिमाचल की सांस्कृतिक तस्वीर को इतना समृद्ध बना दिया है कि हर पन्ना पढ़ हुए है, आप खुद वहां हैं। भाग-1 में छिपे ग सिद्धांत, अनकहे किस्से और ग्रामीण के सूक्ष्म पहलू नए दृष्टिकोण से सामने आते हैं। यह सिर्फ एक इलेक्शन नहीं, बल्कि एक भुलैया जैसा सफर है, जहाँ आप हिमालय की गिरती सुरताल, मिट्टी कींधी खुशबू और मानवीय आत्मा की अदम्य जुझारू शक्ति को हर लकीर महसूस।








