हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत - बारू राम ठाकुर / मिहिर बोराना
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हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत – बारू राम ठाकुर / मिहिर बोराना
Original price was: Rs.400.00.Rs.320.00Current price is: Rs.320.00.Buy Now—इस में आपको मिलेगा प्रदेश की सांस्क विरासत का हर रूप-रंग। बारू राम ठाकुर और मिहिर बोराना ने मिलकर हिमाचल की लोकथाओं, मेलों-त्योहारों, वादयंत्रों और लोकृत का ऐसा समग्र दर्शनचा, जो पाठक को हर पन्ने पर न जानकारी सिर्फ देता है, बल्कि उसकी कल्पाओं को नए आयाम प्रदान करता हैचुण्डा देवी मंदिर की वृद्ध टेराकोटा मूर्तियों से लेकर मनाली के बजार में बुनकरों के ताने-बाने तक, हर अध्याय हिमाचल की विविधता का जश्न मनाता। आप सुनेंगे ग्रामीण वाद जैसेोल, बंसुरी और शहनाई की लहरी, महसूस करेंगे किच्ची व चवरी चाय मिठास औरेंगे हूणाओं की चमत्कारिक कथाएँ। इसके साथ ही हथकरघा उद्योग, धूल मिट्टी की कलाकृतियाँ और पहाड़ी व्यंजनों कीबू भी जीवंत हो उठेगी। लेखकों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति आपको हिमाचल की वादियों में ले, जहाँ प्रत अनुभव और शोधपरक तथ्य एक साथ मिल इतिहास और लोकजीवन को नया स्वरूप देते हैं। उन पुरानी हवेलियों की खिड़कियों से झांकती परंपराएँ, पहाड़ी लोगों का जीवन-शैली और प्रकृति से उनका अनूठा रिश्ता—सब यहाँ आपके समक्ष खुले दिल से है। यदि हिमाचल की आत्मा कोना चाहते हैं, उसकीूँज से आँचल लेना चाहते हैं, तो इस पुस्तक में छुपी विरासत की हर गुंजलदार धड़कन आपके भीतर एक नई ताजगी भर देगी।
– हिमाचल प्रदेश की लोक संगीत और नृत्य परंपराएँ
– पारंपरिक शिल्प और कारीगरी – मान्यताएँ, रीति-रिवाज और तीर्थ स्थल
– स्थापत्य विरासत और ऐतिहासिक स्मारक
– मौखिक साहित्य, लोककथाएँ, कहानी सुनाना
– त्यौहार, मेले और सामुदायिक उत्सव
– स्वदेशी समुदाय और सामाजिक रीति-रिवाज
– अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत और संरक्षण प्रयास
पर्वतों की गोद में बसीाचल प्रदेश की प्राचीन परंपराएँ, लोकगीतों की अनुगूँज और देव-देवताओं की अविचल आस्था इसी अनूठी रूप में जीवंत होती दिखती है। सुनहरी धूप में चमकते मंदिरों के शंखनाद से लेकर बर्फ से ढ गाँवों में गूंजते पेण्डल केृत्य तक, हर चित्र-अलंकरण हिमाच संस्कृति के रंग और रूप की सम कहानी बयाँ करते हैं। ठ-ठगी, झड़ू और-घगरा की मर्मस्थ धुनें गुर्जर-ठाकुरों की गाएँ और लाहौल स्पीति की बौद्धासत—इन सबका सजीव दस्तावेजकरण पाठक को उस जीवंत लोकजीवन में ले जाता है जहां पर्व-ोहार, हस्तश्प और खानपान आपस में मिलकर एक अलग ही आत्मीयता रच जाते हैं। बारू राम ठाकुर व मिहिर बोराना की सूक्ष्म दृष्टि व सजीव शब्दावलीाचल की सांस्कृतिक विरासत को नित नए आयाम देती है, जैसे कोहरे से उभरता हिमालय।



